अनन्तश्री विभूषित गोवर्धनमठ पुरी पीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंदसरस्वतीजी महाराज

श्री गोवर्धनमठ पुरी के वर्तमान १४५वें जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी महाराज भारत के एक ऐसे युग पुरुष है , जिनसे आधुनिक युग के सर्वोच्च वैधानिक संगठनो संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व बैंक तक ने मार्गदर्शन प्राप्त किया है !
संयुक्त राष्ट्र संघ ने दिनांक २८ से ३१ अगस्त २००० में न्यूयार्क में आयोजित विश्वशांति शिखर सम्मलेन तथा विश्व बैंक ने वर्ल्ड फेथ्स डेवलपमेंट डाइलोग – २००० के वाशिंगटन सम्मलेन के अवसर पर लिखित मार्गदर्शन प्राप्त किया था ! श्री गोवर्धन मठ से सम्बंधित स्वस्तिप्रकाशन द्वारा इसे क्रमशः “ विश्वशांति का सनातन सिद्धांत “ तथा “ सुखमय जीवन का सनातन सिद्धांत “ शीर्षक से सन २००० में पुस्तक रूप में प्रकाशित किया !

इसके अलावा विश्व के २०० देश चिन्हित किये गए है , जिनके वैज्ञानिको ने कंप्यूटर व् मोबाइल फोन से लेकर अंतरिक्ष तक के क्षेत्र में किये गए आधुनिक अविष्कारों में उन वैदिक गणितीय सिद्धांतो का प्रयोग किया है जो पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंदसरस्वतीजी महाराज द्वारा रचित “ स्वस्तिक गणित “ नामक पुस्तक में दिए गए है , शंकराचार्य महाराज जी के अन्य ग्रन्थ “ अंकपदियम “ और “ गणितदर्शन “ नामक दो ग्रन्थ का भी लोकार्पण हुआ है , जो निश्चित ही विश्वमंच पर वैज्ञानिको के लिए विभिन्न क्षेत्रो में नए आविष्कारो के लिए नए परिष्कृत मानदंडो की स्थापना करेंगे !

पूज्यपाद जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंदसरस्वतीजी महाराज इस धरा पर वैदिक सिद्धांतो की साक्षात् वेदमूर्ति है ! वैदिक सिद्धांत एक और जहाँ मानव जीवन एवं सम्पूर्ण जगत को सुखमय , आनंदमय एवं शांतिमय बनाने के लिए प्रत्येक मुलभुत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भोजन , वस्त्र , आवास , शिक्षा , रक्षा , सेवा , न्याय , स्वास्थ्य , पर्यावरण , विवाह , पर्व आदि के विज्ञान तथा समस्त विधाओ का दार्शनिक , वैज्ञानिक एवं व्यह्वाह्रिक ज्ञान देते है…. वहीँ दूसरी ओर वे मानव जीवन के मूल लक्ष्य एवं उसकी सार्थकता जो ईश्वर तत्व के निकट होने और उसे प्राप्त करने में निहित है , का आध्यात्मिक मार्ग भी प्रशस्त करते है !

अपनी भूमिका से भारतवर्ष को पुनः विश्वगुरु के रूप में उभारने वाले पूज्यपाद जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंदसरस्वतीजी महाराज का जन्म ७२ वर्ष पूर्व बिहार प्रान्त के मिथिलांचल में दरभंगा { वर्तमान में मधुबनी } जिले के हरिपुर बख्शिटोल नामक गाँव में आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी , बुधवार रोहिणी नक्षत्र , विक्रम संवत २००० तदनुसार ३० जून ई.सन १९४३ को हुआ ! देश विदेश में उनके अनुयायी उनका प्राकट्य दिवस उमंग व् उत्साहपूर्वक मानते है !

आपके पूज्य पिताजी पं. श्री लालवंशी झा क्षेत्रीय कुलभूषण दरभंगा नरेश के राजपंडित थे ! आपकी माताजी का नाम गीतादेवी था ! आपके बचपन का नाम नीलाम्बर था ! पांच वर्ष की शैशव अवस्था में ही आपको अमृत स्वरुप म्रत्युन्जय होने का अपूर्व बोध हुआ ! मात्र ढाई वर्ष की बाल्यवस्था में आपको श्री राधाकृष्ण का परम अनुग्रह प्राप्त हुआ ! सोलह वर्ष की उम्र में वे अपने गृहग्राम में संग्रहणी के कारण मरणासन्न हो गए थे , तब जीवन से निराश होकर एक दिन संध्या के समय थके – मांदे अपने आम के बगीचे में जाकर पिताजी की समाधी पर दंडवत प्रार्थना की – “ यह शरीर इसी समय शव हो जाए अथवा स्वास्थ्य हो जाए “ , कुछ ही क्षणों में किसी दिव्यशक्ति ने आपको वेगपूर्वक उठा दिया ! उठते ही आपका ध्यान नभोमंडल की और आकृष्ट हुआ , जहाँ श्वेत वस्त्र और पगड़ी धारण किये हुए गोलाकार पद्मासन में बैठे हुए दस हजार पितरो का दर्शन हुआ , पितरो की दिव्य शक्ति एवं अनुग्रह से तत्काल संग्रहणी दूर हुई और वे स्वास्थ्य हो गए !

आपकी प्रारंभिक शिक्षा बिहार और दिल्ली में संपन्न हुई , दसवी तक आप विज्ञान के विद्यार्थी रहे , दो वर्ष तक तिब्बिया कालेज दिल्ली में अपने अग्रज डा. श्री शुकदेव झा जी के छत्रछाया में शिक्षा ग्रहण की ! पढाई के साथ साथ कुश्ती , कबड्डी और तैरने में अभिरुचि के अलावा फ़ुटबाल के भी अच्छे खिलाडी थे , बिहार और दिल्ली में आप छात्रसंघ , विद्यार्थी परिषद् के उपाध्यक्ष व् महामंत्री भी रहे !

दिल्ली में आपकी साधना आपके एक अन्य अग्रज पं. श्रीदेव झा जी मार्गदर्शन में संपन्न हुई , एक वर्ष में आपने बावन तंत्र ग्रंथो का अध्ययन किया तथा इष्टदेवी अन्नपूर्णा की उपासना की …..दिल्ली में तिब्बिया कालेज डी-8 ब्लोक के ऊपर कक्ष में रहते हुए आपने गीता का अध्ययन और योग शुभारम्भ किया , भगवत्कृपा से मिथिलांचल में प्रारम्भ योगसाधना यहाँ पूर्ण हुई तथा भुवन भास्कर से भवभयकारक , योगिवृन्द दुर्लभ तत्वबोध सुलभ हुआ !

अपने अग्रज पं. श्रीदेव झा जी की प्रेरणा से आपने दिल्ली में सर्ववेद शाखा के अवसर पर पूज्यपाद धर्मसम्राट स्वामी करपात्रीजी महाराज एवं ज्योतिर्मठ बद्रिकाश्रम के पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी श्री कृष्णबोधाश्रमजी महाराज का दर्शन प्राप्त किया , इस अवसर पर आपने श्री करपात्रीजी महाराज को ह्रदय से अपना गुरुदेव मान लिया , तिब्बिया कालेज में जब आपकी सन्यास की भावना तीव्र होने लगी तब आप किसी को बताए बिना ही काशी की और पैदल ही चल पड़े ……इसके उपरांत आपने काशी , वृन्दावन , नैमिषारण्य , बद्रिकाश्रम , ऋषिकेश , हरिद्वार , पुरी , श्रंगेरी आदि प्रमुख धर्म स्थानों में रहकर वेद-वेदांग आदि का गहन अध्यन किया ! नैमिषारण्य के पूज्य स्वामी नारदानंद सरस्वती जी ने आपका नाम “ ध्रुवचैतन्य ” रखा …..आपने ७ नवम्बर १९६६ को दिल्ली में अनेक वरिष्ठसंत-महात्माओं एवं गौभाक्तो के साथ गौरक्षा आन्दोलन में भाग लिया , इस पर उन्हें ९ नवम्बर को बंदी बनाकर ५२ दिनों तक तिहाड़ जेल में रखा गया !
वैशाख कृष्ण एकादशी गुरुवार विक्रम संवत २०३१ तदनुसार दिनांक १८ अप्रेल १९७४ को हरिद्वार में आपका लगभग ३१ वर्ष की आयु में पूज्यपाद धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज के करकमलो से सन्यास संपन्न हुआ और उन्होंने आपका नाम “ निश्चलानंदसरस्वती “ रखा ! श्री गोवर्धन मठ पुरी के तत्कालीन १४४ वे शंकराचार्य पूज्यपाद जगत्गुरू स्वामी श्री निरंजनदेव तीर्थ जी महाराज ने स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी को अपना उत्तराधिकारी मानकर माघशुक्ल षष्ठी रविवार विक्रम संवत २०४८ तदनुसार दिनांक ९ फरवरी १९९२ को उन्हें अपने करकमलो से गोवर्धनमठ पुरी के १४५वे शंकराचार्य पद पर पदासीन किया !

शंकराचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने के तुरंत बाद आपने “ अन्यो के हितो को ध्यान में रखते हुए हिन्दुओ के आदर्श व् आस्तित्व की रक्षा , देश की सुरक्षा और अखंडता “ के उद्देश्य से प्रमाणिक और समस्त आचार्यो को एक मंच पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए राष्ट्र रक्षा के इस अभियान को अखिल भारतीय स्वरुप प्रदान करने की दिशा में अपना प्रयास आरम्भ कर दिए !

राष्ट्र रक्षा की अपनी राष्ट्रव्यापी योजना को मूर्तरूप दिलाने हेतु उन्होंने देश के प्रबुद्ध नागरिको के लिए पीठ परिषद् और उसके अंतर्गत युवको की आदित्य् वाहिनी तथा मातृशक्ति के लिए आनंद वाहिनी के नाम से एक संगठनात्मक परियोजना तैयार की ! इसमें बालको के लिए बाल आदित्य वाहिनी एवं बालिकाओ हेतु बाल आनंद वाहिनी की व्यवस्था भी की गयी है ! पूज्यपाद जगत्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज ने चैत्र शुक्ल नवमी शनिवार विक्रम संवत २०४९ तदनुसार दिनांक ४ अप्रेल सन १९९२ को रामनवमी के शुभ दिन पर श्री गोवर्धन मठ पुरी में पीठ परिषद् और उसके अंतर्गत “ आदित्यवाहिनी “ का शुभारंभ करवाया ! कलयुग में संघ में शक्ति निहित है , धर्म , ईश्वर ,और राष्ट्र से जोड़ने का कार्य संघ द्वारा सम्पन्न हो यह आवश्यक है !

पूज्यपाद जगत्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी द्वारा स्थापित पीठ परिषद् और उनके अंतर्गत आदित्यवाहिनी एवं आनंदवाहिनी का मुख्य उद्देश्य अन्यो के हित का ध्यान रखते हुए हिन्दुओ के आस्तित्व और आदर्श की रक्षा तथा देश की सुरक्षा और अखंडता है ! पूज्यपाद महाराज श्री का अभियान मानवमात्र को सुबुद्ध , सत्यसहिष्णु और स्वावलंबी बनाना है ! उनका प्रयास है कि पार्टी और पंथ में विभक्त राष्ट्र को सार्वभौम सनातन सिद्धांतो के प्रति दार्शनिक , वैज्ञानिक और व्यह्वाह्रिक धरातल पर आस्थान्वित करने का मार्ग प्रशस्त हो ! उनका ध्येय है कि सत्तालोलुपता और अदुर्दर्शिता के वशीभूत राजनेताओ की चपेट से देश को मुक्त कराया जाय ! बड़े भाग्यशाली है वे लोग जिन्हें विश्व के सर्वोच्च ज्ञानी के रूप में प्रतिष्ठित इन महात्मा द्वारा चलाए जा रहे अभियान में सहभागी बनाने और जिम्मेदारी निभाने का सुअवसर मिला हुआ है !

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